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Monday, May 24, 2021

गूगल - तीन प्रेम कविताएँ

1. 
क्या तुम्हारा नाम ’गूगल’ है ? 
क्यों कि तुम में वो सब है .. 
जो मैं अक्सर ढूँढता रहता हूँ ।


2.
मेरा प्रश्न 
पूरा करने से पहले ही 
तीन सुझाव और छः उत्तर 

तुम ना !  सचमुच में  गूगल हो ....   



3. 
मैं ज़िन्दगी का 
हर एक कठिन प्रश्न 
गूगल से पूछने के बाद
तुम्हारी ओर देखता हूँ ,

और अक्सर 
तुम जो भी कहती हो 
वही सच मान लेता हूँ |

गूगल ! तुम मुझ से नाराज तो नहीं हो ना ?


-अनूप भार्गव

Monday, February 01, 2021

एक और नये वर्ष में

एक और नये वर्ष में 
प्रवेश कर रही है दुनिया
और दुनिया के साथ मैं भी 
इसका इतिहास 
नहीं पता है मुझको
काँप रहे हैं मेरे पैर
न जाने क्यों 
इस नये साल में 
जाने के लिए 
शायद डर रही हूँ 
बीते साल को याद कर  
नया साल क्या लाएगा!
मुझे नहीं पता 
शायद यह लबालब होगा
प्यार और उत्साह से 
या अभिशप्त होगा
अकेलेपन की त्रासदी झेलने को 
जो बिछड़ गये 
उन्हें वापस लाना संभव ना हो 
लेकिन जो बचे रह गये हैं
शायद उन्हें ला सके 
थोड़ा और क़रीब अपनों के 
लेकिन मैंने सुनी है 
एक कानाफूसी  
कानाफूसी की फुसफुसाहट से 
पता चला है कि- 
सब कुछ ठीक ही होगा
इस नये साल में
लोग निकल सकेंगे
सड़कों पर बिना डरे
मजदूरों से भरे रहेंगे कारखाने
किसान खुश हो सकेंगे
देख देख अपनी लहलहाती फसलें  
मैं भी खुश हो लूँगी
यह सब देख-देख 
इतनी खुशी तो
सौंप ही देना मेरे नववर्ष

-वंदना वात्स्यायन

Friday, January 29, 2021

सूर्य नूतन वर्ष का अब काश ऐसी भोर लाए!

हो उजाला सूर्य का,चन्द्रमा किरणें बिछाये ,
अम्बु अमृत छिड़क छेड़े ,पवन सहला कर जगाये ,
शिशु धरा का अब उठे तम से निकल कर बाहर आये 
सूर्य नूतन वर्ष का काश ऐसी भोर लाये!

सुर हृदय की तंत्रियों के, खुद ब खुद ही खनक जाएँ 
मन सभी का मिल सुर में, वृहद् एक आलाप गाएँ ,
कम्पनों की लड़ियाँ बन कर, जग पे नव सी भोर छाए,
गूँजे समरसता की सरगम, विजन वन भी जाग जाये,
सूर्य नूतन वर्ष का काश ऐसी भोर लाये!

छूटे बंधन कलुषता के, नव पगों से आस आये,
छोड़ना जो चाहते , दृढ़ता से उसको अमल लायें ,
नव शिरों से नव -धरा को, नई सी एक सांस आये
बने फिर भारत जगतगुरु, विश्व तक पैगाम जायेI
सूर्य नूतन वर्ष का काश ऐसी भोर लाये I 

-ममता शर्मा

नव-वर्ष में बढ़े प्रेम-विश्वास

रीत-रिवाज वहन-चलन हित,
पूर्व-संध्या पर सजते साज
दु:ख-दर्द से पिंड छुटा हो
या फिर आशान्वित उल्लास

नियम-निष्ठ सा दिवस ढल गया
शाम अलग सी, उदित हुलास
प्रदोष-पल में, पिया मिलन की
तरणि-तपी जगा गया आस
 
उमंग अनंत, अरमान अशेष 
मचल गये, हों पूरित आज 
दूर अभी है कल की भोर
सजनी रजनी, पुलकित गात
 
आहों के उन्मत्त असर में,
प्रबल हुई चकोरी आस
किस पल ढ़ले ज्वर-उन्माद
किस पल खिले सुप्रभा आज
 
निशा बीत गयी पहर-पहर
मन:दृग अश्रु बहे झर-झर
चकवी करती रैन विलाप 
न जाने कब होगा प्रभात 
 
निशा झारति तारक-राख
शलभ शिथिल, निरुन्माद
विरहाकुल, भर नयन विहाग
स्नेहातुर उर मूक निराश

आस-निरास भँवर में उल्झी
ज्यों-त्यों कटी विरह की रात 
उषा-याम, शुभ्र ज्योतिर्मय 
बिखर गया तम का अवसाद

स्वाति-सारंग कथा परिकल्पित 
दृढ़-संकल्प दिलाता याद
सृष्टि का ध्रुवीय-अनुराग 
चन्दा-चकोर प्रेम की बात
 
अश्रु-हास की ले सौग़ात
आया फिर से मधु-प्रभात
प्रीत की रीत, आस-अभिलास
नव-वर्ष में बढ़े प्रेम-विश्वास! 

-राय कूकणा

Thursday, January 28, 2021

नए साल की नई आशाएँ

नए साल की नई आशाएँ 
कुछ अपनी कुछ पराई
गुजरे साल की स्मृतियाँ 
कुछ दुखद कुछ सुखदाई।
 
माना, वक्त की करवट से 
आती सुनामी और प्रलय
कभी सहते घोटालों की मार,
भ्रष्टाचार रूपी आँधी  
नियति मान, करें संतोष 
पर कैसे सहे मानवता की हार
जब हो अपराध जघन्य 
न्याय के प्रहरी हों अपराधी
 ऐ मानव! कर विचार, 
क्यों हो नारी पर हिंसक वार
नारी नहीं भोग की वस्तु,
क्यों हो चौराहों पर शर्मसार
आओ, संकल्पों में एक संकल्प 
ऐसा ले इस नव वर्ष
फलीभूत होंगे नव विकल्प, 
नव उत्कर्ष, नव निष्कर्ष
नए साल में रख लें, 
यादों के संदूक में सहेज
गुजरे साल की 
सुखद स्मृतियों के खनकते सिक्के
नए साल में 
निराशा की गठरी न लाद
दुखद स्मृतियों से ले प्रेरणा
बनेंगे संभलते चक्के
अतीत, समय की सड़क पर 
है मील का वह पत्थर
जिससे पता चलता, 
मंजिल कितनी पास या दूर
उन मोतियों को पिरोये जो 
दामन में गुजरा साल
देकर जा रहा,ज्यों 
चंदा की चांदनी,सूरज का नूर

-संतोष भाऊवाला

सपनों का नवयुग सृजित करूँगा

महामारी के आतंक पर- 
लटका यह पंचांग
कल, एक वर्ष पुरातन हो जाएगा
नूतन वर्ष की नई सुबह में
यह पंचांगबदला जाएगा
डायरी के नए पृष्ठ,
कुछ अलग अंदाज से खोलूँगा
शब्दों में नया जीवन,
नये ढँग से ढूँढ लूँगा।
वादा है इस नव वर्ष में,
नई विधाएँ भी लिखूँगा।
विगत वर्ष के विध्वंस पर,
सपनों का नवयुग सृजित करूँगा!

गत वर्ष जो आया था,
मुँह खोले विकराल बड़ा
लील रहा था वह विषधर,
मानव जाति को खड़ा-खड़ा
लाश पगडंडियों पर बिछी थीं,
गिद्धों ने किया महाभोज !
चीलों की क्षुधा मिटी,
करते थे मुर्दों की खोज!
प्रण है,इस नूतन वर्ष में,
मृत्यु से जीवन खींच लूँगा
विगत वर्ष के आकुल विध्वंस पर,
सपनों का नवयुग सृजित करूँगा!

पीकर शिव ने विष का प्याला
कंठ कर लिया है नीला
अमृत की कुछ बूंदें चखा दे,
तिक्त बहुत था विष का हाला
दुर्घटनाएं थी अप्रत्याशित सब,
अपनों को भी न दे पाई विदाई!
गरल, काल का घोंट रहे थे,
विछोह हुआ बड़ा दुखदाई!
दूरी से झुलसे रिश्तो पर,
फिर से नरम मरहम रखूँगा।
विगत वर्ष के आकुल विध्वंस पर,
सपनों का नवयुग सृजित करूँगा!

बीत गई वेदना की रजनी,
कटा नियति का दुखद लेख
नव वर्ष में बदल जाएगी,
शायद इन हाथों की रेख 
साकार मधुर एक उम्मीद,
स्वस्थ शरद ऋतु लाएगी
फूटेंगी आशा की किरणें,
हर घर के भीतर आयेंगीं
तृष्णा के विचलित तिमिर में,
दिनकर की रश्मियाँ भर लूँगा!
विगत वर्ष के आकुल विध्वंस पर,
सपनों का नवयुग सृजित करूँगा!

-डा० स्मिता सिंह

मंगलमय नववर्ष

मंगलगीत
नववर्ष की बेला
हटे मिथक
भ्रम,ईर्ष्या मन का!
प्रीत नई चेतना
माधुर्य भाव
सिंदूरी आभा संग
लेकर आई भोर
सकारात्मकता की सौगात
मेरे अँगना!
नव ऊर्जा संचार हो
हो मन ने स्नेह का नव अंकुर
क्रोध,अहंकार,द्वेष का हो नाश
बहे ज्ञान की सरिता निर्मल
समर्पण भाव का शृंगार हो
मानवता पथ में अग्रसर
सबके लिए मंगलमय हो
नववर्ष का हर एक पल
भविष्य स्वर्णिम और सुखद हो
सबके लिए हो 
उज्ज्वल हो
मंगलमय नववर्ष !

  -नीलम अजित शुक्ला

नव वर्ष आया।

विगत वर्षों-सा
नव प्रभात के साथ
नव वर्ष आया
अतिथि सम
उपहार भी लाया
आकाश के बड़े टोकरे में
कोहरा संग लाया
नव वर्ष आया।

धुंध की चादर ओढ़
ठंड से ठिठुरता
बर्फ से खेलता
बदन कँपकपाता
हर्ष उल्लास के साथ
कण-कण में छाया
नव वर्ष आया।

पुरातन चला तो गया
पर खुशी-खुशी नहीं
जाना पड़ा उसे
नहीं सह पाया वह
प्रकृति की मार
नहीं झेल पाया झंझावात
सूर्य चंद्र ग्रहण के दुष्प्रभाव
जन जीवन का आक्रोश
अशांति और भय
कुर्सी की चाह
नारी की दुर्दशा
बच्चियों का अपमान
दरिंदगी, बेइमानी
कटुता और स्वार्थ
कोरोना से जंग करता
कुछ-कुछ अकुताया
नव वर्ष आया।

शिशु-सा आगमन
नव वर्ष का आरम्भ 
उसका यह बचपन
सहर्ष स्वीकार करेंगे
सजाएँगे संवारेंगे
खुशियाँ मनाएंगे
हँसेंगे हँसाएंगे
सभी उसे दुलारेंगे
और घुटनों चलते
जब स्वयं उठ खड़ा होगा
समय के थपेड़े झेलता
सर उठाकर चलेगा
यौवन का उत्साह झलकेगा
वास्तविकता का एहसास होगा
एहसास जगाता
नई योजनाओं को 
साथ लेकर आया
नव वर्ष आया।

बिखरा-सा आसपास
क्या सँवरा क्या सँवारना 
क्या खोया क्या अवशेष
जिम्मेदारी का एहसास
होगा प्रयास
बागडोर संभालने का
धीरे-धीरे क़दम उठेंगे
लक्ष्य की ओर बढ़ेंगे
अस्तित्व को बचाता
अवशेष को समेटता
कुछ नया रचता
नज़र आएगा प्रतीक्षारत
उत्फुल्ल नवप्रभात
नव उमंगों के साथ
नव उल्लास छाया
नव वर्ष आया।

-कविता कालिंदी

नया वर्ष गहराई से

बीती है एक और रात 
नया वर्ष गहराई से 
समझाता यह बात 
मानो या ना मानो बस 
बीती है एक और रात। 

पहले जैसे उड़ते बढ़ते 
पल होंगे मतवाले 
अम्मा पप्पू पापा पापे 
बाजू वाले लाले
आँख गड़ाकर टी वी में 
मुँह में लेकर जज़्बात 
नया वर्ष गहराई से 
समझाता यह बात 

सबके हाथों में मोबाइल
लाल सफ़ेद या काले 
कोने-कोने बैठे लेकर 
सारे ही घर वाले 
मेसेंजर पर झूठी सच्ची 
भेजेंगे सौग़ात 
नया वर्ष गहराई से 
समझाता यह बात 

-ममता शर्मा

ऐसा नया साल हो

आँखों में हो सपने
साथ हों कुछ अपने
जीने का नया राग हो
ऐसा नया साल हो

सिर पर हो आसमान 
पांवों के नीचे ज़मीन
सजन तू मेरे साथ हो
ऐसा नया साल हो 

हर शाख पर कलियाँ खिलें
हर बाग में नयी बहार हो
हर सांस सलीके से चले
ऐसा नया साल हो

बच्चों की मुस्कान खिले
बूढ़ों का सम्मान हो
खुशी की किलकारियां गूंजे
ऐसा नया साल हो

-रीमा दीवान चड्ढा

नूतन वर्ष मंगलमय हो

नई उमंग लिए आया
वर्ष दो हजार इक्कीस 
मुस्कुरा कर करें स्वागत हम
नूतन वर्ष मंगलमय हो।

नए वर्ष की नई रोशनी
जन मन को करें प्रकाशित 
भरे मानव उर नई लालसा से
स्वयं ही धुल जाए
मन की मलिनता 
श्यामल धरती के हर प्रांगण में
हो सुख समृध्दि
बहे सौरभमय चपल समीर
हम पर कल जो गुजरा
दुआ है कल न गुजरे
जीवन की हर कल्पना
हो वसुधैवकुटुम्ब अपना
न हो भूखी नंगी मानवता
न लुटे रोटी का अधिकार
विकसित हो नव लोकतंत्र
सह अस्तिव समन्वयवादी का
सूरज की नव किरणों तले
नई प्रेरणा नव आशा पाएँ
हर स्वर विश्वासपूर्ण हो
करें नव वर्ष का अभिनन्दन।

-सूरजमणि स्टेला कुजूर


हम ऐसे नववर्षँ मनाएँ !

चहुँ दिसि छाए हर्ष
बांटें खुशियाँ, बढ़ें चौगुनी
द्वार द्वार मुस्काएँ दीप
वक़्त से कुछ पल चुराएं
अनजानों में बाँट आएं
हम ऐसे नववर्षँ मनाएँ!

रोज़ की रोटी, जिनकी चिंता
बन जाती है चिता समान
ऑंखों में उनके कुछ सपने
मिलकर उनके साथ सजाएं
नववर्ष का बिगुल बजाएं
संवादहीनता दूर भगाएं
हम ऐसे नववर्षँ मनाएँ!

चैट ग्रुप से चौपालों तक
चलो आज फिर लौट आएं
हँसकर बोलें, दिल खोलें
जीवन के अवसाद मिटाएं
नए वर्ष में गले लगाएं
मिल जुल बैठें, दूरी अपनाएँ
आने वाली है वैक्सीन
कोरोना को मार भगाएं
हम ऐसे नववर्षँ मनाएँ!

-अचला झा